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उत्तराखण्ड  राज्य के   प्रचलित लोकनृत्य    छलिया- छलिया नृत्य  (जिसे  छोलिया  भी कहा जाता है)  उत्तराखंड  राज्य के  कुमाऊं   क्षेत्र का एक प्रचलित लोकनृत्य है। यह एक तलवार नृत्य है, जो प्रमुखतः शादी-बारातों या अन्य शुभ अवसरों पर किया जाता है।  यह विशेष रूप से   कुमाऊँ मण्डल   के   पिथौरागढ़ ,   चम्पावत ,   बागेश्वर   और   अल्मोड़ा   जिलों में लोकप्रिय है। एक छलिया टीम में सामान्यतः २२ कलाकार होते हैं, जिनमें ८ नर्तक तथा १४ संगीतकार होते हैं। इस नृत्य में नर्तक युद्ध जैसे संगीत की धुन पर क्रमबद्ध तरीके से तलवार व ढाल चलाते हैं, जो कि अपने साथी नर्तकियों के साथ नकली लड़ाई जैसा प्रतीत होता है। वे अपने साथ त्रिकोणीय लाल झंडा (निसाण) भी रखते हैं। नृत्य के समय नर्तकों के मुख पर प्रमुखतः उग्र भाव रहते हैं, जो युद्ध में जा रहे सैनिकों जैसे लगते हैं। ऐसा माना जाता है की छलिया नृत्य की शुरुआत  खस  राजाओं के समय हुई थी, जब विवाह तलवार की नोक पर होते थे।  चंद राजाओं  के आगमन...
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उत्तराखंड की प्रसिद्ध मिठाई उत्तराखंड की प्रसिद्ध मिठाई में सबसे पहले नाम आता है बाल मिठाई का लेकिन इसके अलावा भी उत्तराखंड की कहीं सारी मिठाईयाँ ऐसी है जिनका नाम बहुत कम लोगों ने ही सुना होगा। तो जानिए बाल मिठाई के अलावा उत्तराखंड की प्रसिद्ध मिठाईयों के बारे में।  बाल मिठाई बाल मिठाई   भा रत   के  उत्तराखंड  राज्य की एक लोकप्रिय मिठाई है। यह भुने हुए  खोये  पर चीनी की सफेद गेंदों के लेप द्वारा बनायी जाती है, और दिखने में भूरे चॉकलेट जैसी होती है। यह विशेष रूप से  अल्मोड़ा  के आसपास के क्षेत्रों में प्रसिद्ध है। खोये को चीनी मिलाकर तब तक पकाया जाता है, जब तक कि वह दिखने में चॉकलेट के सामान नहीं हो जाता। उसे कुछ समय तक जमने दिया जाता है, और फिर आयताकार टुकड़ों में काट कर चीनी की सफेद गेंदों से सजाया जाता है। कुमाऊं  क्षेत्र में बाल मिठाई लगभग ७वीं - ८वीं सदी ई में  नेपाल  से आयी थी। [1]  विद्वानों का यह भी मानना है कि बाल मिठाई शुरू में सूर्य देवता को अर्पित किया ...
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भांग की चटनी                                   भांग के पौधे के बीज भांग के फल की तरह नशा पैदा करने वाले नहीं होते हैं बल्कि ये सेहत के लिए बेहद लाभकारी होते हैं. भांग के बीजों में प्रोटीन, फाइबर, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड होता है इसलिए इसका सेवन करना त्वचा और बालों की सुंदरता के लिए बेहद लाभकारी होता है. भांग के बीजों में मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स त्वचा, दिल और जोड़ों के लिए फायदेमंद होते हैं. भांग के बीजों में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन होता है. 30 ग्राम भांग के बीजों में लगभग 9.46 ग्राम प्रोटीन होता है जो कि मसल्स के निर्माण में मददगार होते हैं. इसके बीजों में पर्याप्त मात्रा में फाइबर होता है. इसका सेवन करने से पेट भरा रहता है और बार-बार भूख नहीं लगती है.             भांग शब्द सुनते ही अधिकांश लोगों के दिमाग में नशे जैसा कुछ आता हो या जै-जै शिव-शंकर की धुन बजती हो लेकिन अगर आप उत्तराखंड से हैं तो भांग से सबसे पहले आपको भांग की चटनी याद आयेगी. फिर आलू के गुटके, मडुवे की ...
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गहत                                                 पहाड़ में सर्द मौसम में गहत की दाल लजीज मानी जाती है। प्रोटीन तत्व की अधिकता से यह दाल शरीर को ऊर्जा देती है, साथ ही पथरी के उपचार की औषधि भी है।यूं तो गहत आमतौर पर एक दाल मात्र है, जो पहाड़ की दालों में अपनी विशेष तासीर के कारण खास स्थान रखती है। वैज्ञानिक भाषा में डौली कॉस बाईफ्लोरस नाम वाली यह दाल गुर्दे के रोगियों के लिए अचूक दवा मानी जाती है। उत्तराखंड में 12,319 हेक्टेयर क्षेत्रफल में इसकी खेती की जाती है।                              खरीफ की फसल में शुमार गर्म तासीर वाली यह दाल पर्वतीय अंचल में शीतकाल में ज्यादा सेवन की जाती है। पहाड़ में सर्द मौसम में गहत की दाल लजीज मानी जाती है। प्रोटीन तत्व की अधिकता से यह दाल शरीर को ऊर्जा देती है, साथ ही पथरी के उपचार की औषधि भी है। पर्वतीय क्षेत्र में गहत दाल दो प्रजातियां क्रमश: काली व भूरी के रू...
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मडुआ                                                                 मडुआ और रागी को कई अलग-अलग स्‍थानीय नामों से जाना जाता है। जहां उत्तराखंड के कुमांऊ में क्षेत्र में इसे मडुआ के नाम से जाना जाता है तो वहीं तेलगु और कन्‍नड़ भाषा में इसे रागी के नाम से जाना जाता है।  रागी या मडुआ के आटा पोष्टिक तत्‍वों से भरपूर अनाज की एक किस्‍म है जिसका इस्‍तेमाल रोटी, सूप, जूस, उपमा, डोसा, केक, चॉकलेट, बिस्किटस, चिप्स, और आर्युवेदिक दवा के रूप में होता है।                                  कई घरो में मडुए के आटे को गेंहू के आटे के साथ मिलाकर रोटी बनाकर खाई जाती है। ये शरीर को कई बीमार‍ियों से न‍िजात द‍िलाता है। मडुआ के आटे में केल्शियम, प्रोटीन, ट्रिपटोफैन, आयरन, मिथियोनिन, रेशे, लेशिथिन जैसे पौष्टिक तत्‍व पाएं जाते हैं। मडुआ के फायदे 1- मोटापा घटाने के लि...
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तिमूर                                       भारत के तमाम राज्‍यों में औषधीय गुण वाले तमाम पेड़-पौधे मौजूद हैं। इन्‍हीं में से एक है पहाड़ी नीम यानी तिमूर जो मुख्‍य तौर पर उत्‍तराखंड में पाई जाती है। इस नीम को कई गुणों से भरपूर माना जाता है और कई छोड़ी-बड़ी बीमार‍ियों के इलाज में इसका इस्‍तेमाल क‍िया जाता है। इस पौधे का इस्‍तेमाल दंत मंजन के रूप में होता है, वहीं माना जाता है क‍ि इसे लेने से बीपी भी कंट्रोल में रहता है। इस कांटेदार पेड़ पर छोटे-छोटे फल लगते हैं और इन दानों को चबाने पर झाग भी बनता है।                                                 इस पौधे का वैज्ञान‍िक नाम जेनथोजायलम अर्मेटम है। झाड़ीनुमा इस वृक्ष की लंबाई 10 से 12 मीटर होती है और तिमूर के अलावा इसे ट‍िमरू और तेजोवती नाम से भी जाना जाता है। इस पौधे की सूखी टहनी बहुत मजबूत होती है जिसके चलते इसे लाठी के तौर...
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थुनेर  थुनेर नाम से अगर आप अनजान है तो हिन्दी को बिरमी और थुनो नाम सुनकर शायद आपको याद आ जाये। असल में बिरमी के छाल, फल और फूल का प्रयोग आयुर्वेद में औषध के रूप में बहुत प्रयोग किया जाता है।  इसके पौष्टिकता के आधार पर इसका प्रयोग कई प्रकार के बीमारियों के इलाज के लिये किया जाता है। कई आधुनिक प्रयोगों से तथा परीक्षणों के आधार पर इसे कैंसर में अत्यन्त उपयोगी माना गया है                                थुनेर 30 मी तक ऊँचा, सदाहरित, एकलिंगाश्रयी वृक्ष होता है। इसका तना अत्यधिक बड़ा, नलिकाकार, कठोर, लगभग 50 सेमी गोलाई में, चौड़े-फैले हुए, शाखा युक्त होते हैं। इसकी शाखाएं सीधी तथा चारों ओर फैली हुई होती है। थुनेर की छाल पतली, कोमल, लाल या भूरे रंग की, खाँचयुक्त तथा पपड़ी जैसा होती है। इसके पत्ते अनेक, सघन रूप में व्यवस्थित, लघु वृंतयुक्त, एकांतर, 0.8-3.8 सेमी लम्बे, रेखित, चपटे, ऊपर की ओर गहरे हरे रंग का एवं चमकीला, आधा भाग पीला-भूरा रंग के अथवा लाल रंग के, कड़े तथा सूखने पर एक प्रकार की विशिष्ट गन्धयुक्त...
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बिच्छू जैसा कि बिच्छू के डंक मारने पर त्वचा में झनझनी सी फ़ैल जाती है ठीक वैसे ही बिच्छू बूटी के पौधे को छूने पर भी होता है. यानी बिच्छू बूटी के पौधे को छूने पर आपके त्वचा में झनझनी या जलन जैसा महसूस होने लगता है. इसका वैज्ञानिक नाम अर्टिका डाईओका है. यदि हम इसके खेती की बात करें तो या अफ्रीका, यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका में उपजाया जाता है. उपयोग 1. रक्त संचार में मदद खून में मौजूद लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन को उत्तेजित करने वाले विटामिन सी और प्रचुर मात्रा में आयरन बिच्छू बूटी में पाया जाता है. अपने इसी गुण के कारण ये हमारे शरीर में रक्त संचार में वृद्धि, गावों को ठीक करने और शरीर के उपरी भागों में उर्जा का स्तर बढ़ाने के लिए ऑक्सीजन पहुँचाने में मदद करता है. 2. प्रेगनेंसी और मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक लेबर पेन से गुजरने वाली महिलाओं की परेशानी कम करने के लिए उन्हें बिच्छू बूटी से जुड़ी चाय पिने की सलाह दी जाती है. एक कोऐग्यलंट के रूप में काम करने वाला बिच्छू बूटी अधिक ब्लीडिंग होने से भी बचाता है. मासिक धर्म के दौरान बिच्छू बूटी के सेवन से महिलाएं ऐंठन और सुजन से काफी हद तक निजात...
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काले भट्ट (Black soybeans, Kala Bhatt)                                            पहाड़ी व्यंजन स्वाद के साथ-साथ सेहत की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग लोग मोटे अनाज के औषधीय गुणों से अच्छी तरह वाकिफ थे, तभी तो मोटा अनाज उनके खान-पान का अहम हिस्सा होता था। काला भट्ट भी ऐसा ही मोटा अनाज है, जिसमें कैंसर जैसी बीमारियों को रोकने के गुण हैं। पहाड़ में सोयाबीन यानी भट्ट की खेती होती है। पहाड़ी इलाकों में भट्ट की अलग-अलग तरह की किस्में मिलती हैं। पारंपरिक व्यंजनों में काले भट्ट ( की दाल को खूब पसंद किया जाता है। मार्केट में इसकी खास डिमांड है। काले भट्ट से चुड़कानी, रसभात, दाल, भट्ट के डूबके जैसे कई व्यंजन बनाए जाते हैं। यही नहीं अब तो सोया सॉस, मोमो चंक, और न्यूट्रेला बनाने में भी इसका इस्तेमाल होने लगा है। इससे नमकीन भी बनती है। चलिए आज आपको गुणकारी भट्ट के फायदे बताते हैं। इसमें प्रोटीन, विटामिन्स, मिनरल्स और फाइबर जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं । भट्ट की चुड...