उत्तराखण्ड राज्य के  प्रचलित लोकनृत्य   

छलिया-

छलिया नृत्य (जिसे छोलिया भी कहा जाता है) उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं क्षेत्र का एक प्रचलित लोकनृत्य है। यह एक तलवार नृत्य है, जो प्रमुखतः शादी-बारातों या अन्य शुभ अवसरों पर किया जाता है। यह विशेष रूप से कुमाऊँ मण्डल के पिथौरागढ़, चम्पावत, बागेश्वर और अल्मोड़ा जिलों में लोकप्रिय है।

एक छलिया टीम में सामान्यतः २२ कलाकार होते हैं, जिनमें ८ नर्तक तथा १४ संगीतकार होते हैं। इस नृत्य में नर्तक युद्ध जैसे संगीत की धुन पर क्रमबद्ध तरीके से तलवार व ढाल चलाते हैं, जो कि अपने साथी नर्तकियों के साथ नकली लड़ाई जैसा प्रतीत होता है। वे अपने साथ त्रिकोणीय लाल झंडा (निसाण) भी रखते हैं। नृत्य के समय नर्तकों के मुख पर प्रमुखतः उग्र भाव रहते हैं, जो युद्ध में जा रहे सैनिकों जैसे लगते हैं।

ऐसा माना जाता है की छलिया नृत्य की शुरुआत खस राजाओं के समय हुई थी, जब विवाह तलवार की नोक पर होते थे। चंद राजाओं के आगमन के बाद यह नृत्य क्षत्रियों की पहचान बन गया। यही कारण है कि कुमाऊं में अभी भी दूल्हे को कुंवर या राजा कहा जाता है। वह बरात में घोड़े की सवारी करता है तथा कमर में खुकरी रखता है।

इसके अतिरिक्त छलिया नृत्य का धार्मिक महत्व भी है। इस कला का प्रयोग अधिकतर राजपूत समुदाय की शादी के जुलूसों में होता है। छलिया को शुभ माना जाता है तथा यह भी धारणा है की यह बुरी आत्माओं और राक्षसों से बारातियों को सुरक्षा प्रदान करता है।

छलिया नृत्य में कुमाऊं के परंपरागत वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें तुरी, नागफनी और रणसिंह प्रमुख हैं। इनका प्रयोग पहले युद्ध के समय सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए किया जाता था। तालवाद्यों में ढोल तथा दमाऊ का प्रयोग होता है, और इन्हें बजाने वालों को ढोली कहा जाता है। इसके अतिरिक्त मसकबीन (बैगपाइप), नौसुरिया मुरूली तथा ज्योंया का प्रयोग भी किया जाता है।

नर्तक पारंपरिक कुमाउँनी पोशाक पहेनते हैं, जिसमें सफेद चूड़ीदार पायजामा, सिर पर टांका, चोला तथा चेहरे पर चंदन का पेस्ट शामिल हैं। तलवार और पीतल की ढालों से सुसज्जित उनकी यह पोशाक दिखने में कुमाऊं के प्राचीन योद्धाओं के सामान होती है।



चौंफला:

चांचड़ी और झुमैलो आदिकाल से ही शरदकालीन त्योहारों का हिस्सा रहे हैं, लेकिन अब वासंती उल्लास का गीत चौंफला भी इनमें शामिल हो गया है। चौंफला का शाब्दिक अर्थ है, चारों ओर खिले हुए फूल। जिस नृत्य में फूल के घेरे की भांति वृत्त बनाकर नृत्य किया जाता है, उसे चौंफला कहते हैं।
मान्यता है कि देवी पार्वती सखियों के साथ हिमालय के पुष्पाच्छादित मैदानों में नृत्य किया करती थीं। इसी से चौंफला की उत्पत्ति हुई। इस नृत्य में स्त्री-पुरुष वृत्ताकार में कदम मिला, एक-दूसरे के विपरीत खड़े होकर नृत्य करते है। जबकि, दर्शक तालियों से संगीत में संगत करते हैं।


तांदी: 

उत्तरकाशी और टिहरी जिले के जौनपुर क्षेत्र में तांदी नृत्य खुशी के मौकों और माघ के पूरे महीने में पेश किया जाता है।

इसमें सभी लोग एक-दूसरे का हाथ पकड़कर श्रृंखलाबद्ध हो नृत्य करते है। इस नृत्य के साथ गाए जाने वाले गीत सामाजिक घटनाओं पर आधारित होते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से रचा जाता है। विशेषकर इनमें तात्कालिक घटनाओं और प्रसिद्ध व्यक्तियों के कार्यों का उल्लेख होता है।


सरौं व पौंणा: 

गढ़वाल में सरौं, छोलिया और पौंणा नृत्य प्रसिद्ध हैं। तीनों की शैलियां अलग-अलग हैं, लेकिन वीर रस एवं शौर्य प्रधान सामाग्री का प्रयोग तीनों में ही किया जाता है।

सरौं नृत्य में ढोल वादक मुख्य किरदार होते हैं, जबकि छोलिया और पौंणा नृत्य को वादक एवं नर्तक के साझा करतब पूर्णता प्रदान करते हैं। इन नृत्यों में सतरंगी पोशाक, ढोल-दमाऊ, नगाड़ा, भंकोरा, कैंसाल, रणसिंगा और ढाल-तलवार अनिवार्य हैं।


झुमैलो: 

झुमैलो सामूहिक नृत्य है, जो बिना वाद्ययंत्रों के दीपावली और कार्तिक के महीने में पूरी रात किया जाता है। गीत की पंक्तियों के अंत में झुमैलो की आवृत्ति और

नृत्य में झूमने की भावना या गति का समावेश होने के कारण इसे झुमैलो कहा गया है। एक तरह से यह नारी हृदय की वेदना और उसकेप्रेम की अभिव्यक्ति है। इसमें नारी अपनी पीड़ा को भूल सकारात्मक सोच के साथ गीत एवं संगीत की सुर लहरियों पर नृत्य करती है।

झोड़ा:

 इसे हिंदी के 'जोड़ा' शब्द से लिया गया है। यह शादी-ब्याह और कौथिग (मेला) में हाथों को जोड़कर या जोड़े बनाकर किया जाने वाला सामूहिक नृत्य है।

जिसके मुख्य रूप से दो रूप प्रचलन में हैं, एक मुक्तक झोड़ा और दूसरा प्रबंधात्मक झोड़ा। प्रबंधात्मक झोड़ा में देवी-देवताओं और एतिहासिक वीर भड़ों का चरित्र गान होता है। इसमें स्त्री-पुरुष गोल घेरा बनाकर एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रख पग आगे-पीछे करते हुए नृत्य करते हैं। घेरे के बीच में मुख्य गायक हुड़का वादन करते हुए गीत की पहली पंक्ति गाता है, जबकि अन्य लोग उसे लय में दोहराते हैं। कुमाऊं के बागेश्वर क्षेत्र में माघ की चांदनी रात में किया जाने वाला यह नृत्य स्त्री-पुरुष का शृंगारिक नृत्य माना गया है।

हारुल:

 महाभारत की गाथा पर आधारित यह जौनसार का प्रमुख लोकनृत्य है। जौनसार क्षेत्र में पांडवों का अज्ञातवास होने के कारण यहां उनके कई नृत्य प्रसिद्ध हैं। इस नृत्य में रामतुला (वाद्ययंत्र) बजाना अनिवार्य होता है।

बुड़ियात:

 जौनसार बाबर में यह नृत्य शादी-ब्याह, जन्मोत्सव जैसे खुशी के मौकों पर किया जाता है।

नाटी: 

यह देहरादून जिले की चकराता तहसील का पारंपरिक नृत्य है। जौनसार क्षेत्र के हिमाचल प्रदेश से जुड़े होने के कारण यहां की नृत्य शैली भी हिमाचल से काफी मिलती-जुलती है। महिला-पुरुष रंगीन कपड़े पहनकर इस नृत्य को करते हैं।

चांचरी (चांचड़ी):

 यह संस्कृत से लिया गया शब्द है, जिसका अर्थ है नृत्य ताल समर्पित गीत।

मूलत: यह कुमाऊं के दानपुर क्षेत्र की नृत्य शैली है, जिसे झोड़े का प्राचीन रूप माना गया है। इसमें भी स्त्री-पुरुष दोनों सम्मलित होते हैं। इसका मुख्य आकर्षण रंगीन वेशभूषा व विविधता है। इस नृत्य में धार्मिक भावना की प्रधानता रहती है

Comments

Popular posts from this blog