थुनेर 





थुनेर नाम से अगर आप अनजान है तो हिन्दी को बिरमी और थुनो नाम सुनकर शायद आपको याद आ जाये। असल में बिरमी के छाल, फल और फूल का प्रयोग आयुर्वेद में औषध के रूप में बहुत प्रयोग किया जाता है।  इसके पौष्टिकता के आधार पर इसका प्रयोग कई प्रकार के बीमारियों के इलाज के लिये किया जाता है। कई आधुनिक प्रयोगों से तथा परीक्षणों के आधार पर इसे कैंसर में अत्यन्त उपयोगी माना गया है
                               थुनेर 30 मी तक ऊँचा, सदाहरित, एकलिंगाश्रयी वृक्ष होता है। इसका तना अत्यधिक बड़ा, नलिकाकार, कठोर, लगभग 50 सेमी गोलाई में, चौड़े-फैले हुए, शाखा युक्त होते हैं। इसकी शाखाएं सीधी तथा चारों ओर फैली हुई होती है। थुनेर की छाल पतली, कोमल, लाल या भूरे रंग की, खाँचयुक्त तथा पपड़ी जैसा होती है। इसके पत्ते अनेक, सघन रूप में व्यवस्थित, लघु वृंतयुक्त, एकांतर, 0.8-3.8 सेमी लम्बे, रेखित, चपटे, ऊपर की ओर गहरे हरे रंग का एवं चमकीला, आधा भाग पीला-भूरा रंग के अथवा लाल रंग के, कड़े तथा सूखने पर एक प्रकार की विशिष्ट गन्धयुक्त होते हैं। इसके फूल एकलिंगाश्रयी, पुंपुष्प-लगभग गोलाकार केटकिन्स में, 6 मिमी व्यास के, पुंकेसर-संख्या में लगभग 10 होते हैं। इसके फल 8 मिमी लम्बे, अण्डाकार, मांसल चमकीले रक्त-वर्ण के तथा बीज एकल, छोटे, अण्डाकार, हरे रंग के तथा लकड़ी की तरह कठोर बीज कवचयुक्त होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल मार्च-मई से सितम्बर-अक्टूबर तक होता है।

आर्तगल का वानास्पतिक नाम 
Taxus wallichiana Zucc. (टैक्सस वालिचिआना) Syn-Taxus baccata Linn होता है। इसका कुल Taxaceae (टैक्सेसी) होता है और इसको अंग्रेजी में Yew (यू) कहते हैं। चलिये अब जानते हैं कि थुनेर और किन-किन नामों से जाना जाता है। 

Sanskrit-स्थौणेयक, शीर्णरोम, शुकच्छद, शुकपुष्प;

 Hindi-बिरमी, थुनो, थुनेर; 

Urdu-बिरमी (Birmi), जरनाब (Jarnab); 

Odia-तालिसभेद (Talisbhed), चालीसपत्र (Chalispatra); 

Kashmiri-पोस्टिल (Postil),बिर्मी (Birmi); 

Kannada-स्थौनेयक (Sthoneyak); 

Gujrati-गेथेला बरमी (Gethela barami); 

Bengali-बिरमी (Bhirmi), सुगन्ध (Sugandh); 

Nepali-धेनग्रेसल्ला (Dhengresalla), वर्मासल्ला (Vermasalla); 

Punjabi-बरमा (Barma), बरमी (Barmi); 

Malayalam-थूरीआंगम (Thuriangam), तूनीयकेम (Tuniyankam); 

Marathi-स्थौनेयक बरमी (Sthoneyak barmi)।

English-हिमालयन यू (Himalayan yew), कामन यू (Common yew)


 सिरदर्द से राहत दिलाने में फायदेमंद थुनेर

थुनेर के मूल से बने अर्क या काढ़ा का प्रयोग करने से  सिरदर्द के इलाज में लाभ मिलता है।
  
लीवर संबंधी समस्याओं के इलाज में लाभकारी थुनेर
थुनेर लीवर यानि यकृत संबंधित रोगों के इलाज में बहुत मदद करता है। इसके लिए थुनेर का सही मात्रा में सेवन करना ज़रूरी होता है।

  -  पेट के सूजन और दर्द से राहत पाने में लाभकारी थुनेर
थुनेर का औषधीय गुण पेट संबंधी समस्याओं से लड़ने में बहुत मदद करता है। 2 भाग थुनेर के पत्ते के चूर्ण में 1 भाग सोंठ चूर्ण तथा 1 भाग कुटकी चूर्ण मिलाकर सेवन कराने से पेट के सूजन तथा दर्द में लाभ होता है।

  - कैंसर के इलाज में फायदेमंद थुनेर
2-5 ग्राम थुनेर पञ्चाङ्ग का काढ़ा बनाकर पीने से कैंसर तथा कैंसर से उत्पन्न उपद्रवों में लाभ होता है। कैंसर के रोगियों को इसके काढ़े के साथ-साथ इसके घनसत्त्व से बने गोलियों का सेवन कराना चाहिए।

  -सांस संबंधी समस्या से राहत पाने में फायदेमंद थुनेर 

अगर सांस संबंधी समस्याओं से ग्रस्त रहते हैं तो थुनेर का उपयोग इस समस्या से निजात दिलाने में मदद कर सकता है।

-थुनेर के पञ्चाङ्ग का काढ़ा बनाकर पीने से कफ निकलने  में मदद मिलती है। इससे खांसी तथा श्वास या सांस संबंधी बीमारियों में फायदेमंद होता है।

-थुनेर के सूखे पत्तों तथा छाल के सत्त का प्रयोग सांस संबंधी चिकित्सा में किया जाता है।

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