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Showing posts from June, 2020
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झंगोरा                                                                              यह सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु चीन, नेपाल, जापान, पाकिस्तान, अफ्रीका के साथ ही कुछ यूरोपीय देशों में भी पैदा किया जाता है. झंगोरे में विपरीत वातावरण में भी पैदा हो जाने की अद्भुत क्षमता होती है. यह बिना किसी उन्नत तकनीक के, कम लागत और न्यूनतम देखभाल में पैदा होने वाला आनाज है. यह उन खेतों में भी आसानी से पैदा किया जा सकता है जहाँ धान और गेहूं नहीं उग पाता. अक्सर इसे धान या खरीफ की अन्य फसलों के साथ मेढ़ों में ही बो दिया जाता है. धान के साथ मेढ़ों पर बोये गए झंगोरे की तुलना करें तो इसकी पैदावार ज्यादा होती है, जबकि इसे उपयुक्त जमीन और देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती.    उत्तराखण्ड में झंगोरा  नाम से पहचाने जाने वाले अनाज का वानस्पतिक नाम इकनिक्लोवा फ्रूमेन्टेंसी (Echinochloa frumentacea) है. अंग्रेजी में इ...
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 उत्तराखंड राज्य में स्थित  बागेश्वर  जिला बागेश्वर   उत्तराखण्ड  राज्य में  सरयू  और  गोमती  नदियों के संगम पर स्थित एक तीर्थ है। यह  बागेश्वर जनपद  का प्रशासनिक मुख्यालय भी है। यहाँ  बागेश्वर नाथ  का  प्राचीन मंदिर  है, जिसे स्थानीय जनता "बागनाथ" या "बाघनाथ" के नाम से जानती है। मकर संक्रांति के दिन यहाँ उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा मेला लगता है। स्वतंत्रता संग्राम में भी बागेश्वर का बड़ा योगदान है।  कुली-बेगार प्रथा के रजिस्टरों को सरयू की धारा में बहाकर  यहाँ के लोगों ने अपने अंचल में गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन शुरवात सन 1920  ई. में की। सरयू एवं गोमती नदी के संगम पर स्थित बागेश्वर मूलतः एक ठेठ पहाड़ी कस्बा है। परगना दानपुर के 473, खरही के 66, कमस्यार के 166, पुँगराऊ के 87 गाँवों का समेकन केन्द्र होने के कारण यह प्रशासनिक केन्द्र बन गया। मकर संक्रान्ति के दौरान लगभग महीने भर चलने वाले  उत्तरायणी मेले  की व्यापारिक गतिविधियों, स्थानीय लकड़ी के उत्पाद, चटाइयाँ एवं शौका तथा भोटिया व्यापारियों ...
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 उत्तराखंड राज्य में स्थित  अल्मोड़ा जिला अल्मोड़ा   भारत  के  उत्तराखण्ड  नामक राज्य में  कुमांऊँ मण्डल  के अन्तर्गत एक जिला है। इस जिले का मुख्यालय भी  अल्मोड़ा  में ही है। अल्मोड़ा अपनी सांस्कृतिक विरासत, हस्तकला, खानपान और ठेठ पहाड़ी सभ्यता व संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है।अल्मोड़ा  दिल्ली  से 365 किलोमीटर और  देहरादून  से 415 किलोमीटर की दूरी पर,  कुमाऊँ हिमालय श्रंखला  की एक पहाड़ी के दक्षिणी किनारे पर स्थित है। आज के इतिहासकारों की मान्यता है कि सन् 1563 ई. में   चन्द राजवंश   के राजा बालो कल्याणचंद ने आलमनगर के नाम से इस नगर को बसाया था।   चंदवंश की पहले राजधानी   चम्पावत   थी।   कल्याणचंद ने इस स्थान के महत्व को भली-भाँति समझा। तभी उन्होंने चम्पावत से बदलकर इस आलमनगर (अल्मोड़ा) को अपनी राजधानी बनाया। सन् 1790 ई. से गोरखाओं का आक्रमण कुमाऊँ अंचल में होने लगा था। गोरखाओं ने कुमाऊँ तथा  गढ़वाल  पर आक्रमण ही नहीं किया बल्कि अपना राज्य भी स्थापित किया। 1801 में...
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उत्तराखण्ड  राज्य के   प्रचलित लोकनृत्य    छलिया- छलिया नृत्य  (जिसे  छोलिया  भी कहा जाता है)  उत्तराखंड  राज्य के  कुमाऊं   क्षेत्र का एक प्रचलित लोकनृत्य है। यह एक तलवार नृत्य है, जो प्रमुखतः शादी-बारातों या अन्य शुभ अवसरों पर किया जाता है।  यह विशेष रूप से   कुमाऊँ मण्डल   के   पिथौरागढ़ ,   चम्पावत ,   बागेश्वर   और   अल्मोड़ा   जिलों में लोकप्रिय है। एक छलिया टीम में सामान्यतः २२ कलाकार होते हैं, जिनमें ८ नर्तक तथा १४ संगीतकार होते हैं। इस नृत्य में नर्तक युद्ध जैसे संगीत की धुन पर क्रमबद्ध तरीके से तलवार व ढाल चलाते हैं, जो कि अपने साथी नर्तकियों के साथ नकली लड़ाई जैसा प्रतीत होता है। वे अपने साथ त्रिकोणीय लाल झंडा (निसाण) भी रखते हैं। नृत्य के समय नर्तकों के मुख पर प्रमुखतः उग्र भाव रहते हैं, जो युद्ध में जा रहे सैनिकों जैसे लगते हैं। ऐसा माना जाता है की छलिया नृत्य की शुरुआत  खस  राजाओं के समय हुई थी, जब विवाह तलवार की नोक पर होते थे।  चंद राजाओं  के आगमन...
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उत्तराखंड की प्रसिद्ध मिठाई उत्तराखंड की प्रसिद्ध मिठाई में सबसे पहले नाम आता है बाल मिठाई का लेकिन इसके अलावा भी उत्तराखंड की कहीं सारी मिठाईयाँ ऐसी है जिनका नाम बहुत कम लोगों ने ही सुना होगा। तो जानिए बाल मिठाई के अलावा उत्तराखंड की प्रसिद्ध मिठाईयों के बारे में।  बाल मिठाई बाल मिठाई   भा रत   के  उत्तराखंड  राज्य की एक लोकप्रिय मिठाई है। यह भुने हुए  खोये  पर चीनी की सफेद गेंदों के लेप द्वारा बनायी जाती है, और दिखने में भूरे चॉकलेट जैसी होती है। यह विशेष रूप से  अल्मोड़ा  के आसपास के क्षेत्रों में प्रसिद्ध है। खोये को चीनी मिलाकर तब तक पकाया जाता है, जब तक कि वह दिखने में चॉकलेट के सामान नहीं हो जाता। उसे कुछ समय तक जमने दिया जाता है, और फिर आयताकार टुकड़ों में काट कर चीनी की सफेद गेंदों से सजाया जाता है। कुमाऊं  क्षेत्र में बाल मिठाई लगभग ७वीं - ८वीं सदी ई में  नेपाल  से आयी थी। [1]  विद्वानों का यह भी मानना है कि बाल मिठाई शुरू में सूर्य देवता को अर्पित किया ...
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भांग की चटनी                                   भांग के पौधे के बीज भांग के फल की तरह नशा पैदा करने वाले नहीं होते हैं बल्कि ये सेहत के लिए बेहद लाभकारी होते हैं. भांग के बीजों में प्रोटीन, फाइबर, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड होता है इसलिए इसका सेवन करना त्वचा और बालों की सुंदरता के लिए बेहद लाभकारी होता है. भांग के बीजों में मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स त्वचा, दिल और जोड़ों के लिए फायदेमंद होते हैं. भांग के बीजों में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन होता है. 30 ग्राम भांग के बीजों में लगभग 9.46 ग्राम प्रोटीन होता है जो कि मसल्स के निर्माण में मददगार होते हैं. इसके बीजों में पर्याप्त मात्रा में फाइबर होता है. इसका सेवन करने से पेट भरा रहता है और बार-बार भूख नहीं लगती है.             भांग शब्द सुनते ही अधिकांश लोगों के दिमाग में नशे जैसा कुछ आता हो या जै-जै शिव-शंकर की धुन बजती हो लेकिन अगर आप उत्तराखंड से हैं तो भांग से सबसे पहले आपको भांग की चटनी याद आयेगी. फिर आलू के गुटके, मडुवे की ...
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गहत                                                 पहाड़ में सर्द मौसम में गहत की दाल लजीज मानी जाती है। प्रोटीन तत्व की अधिकता से यह दाल शरीर को ऊर्जा देती है, साथ ही पथरी के उपचार की औषधि भी है।यूं तो गहत आमतौर पर एक दाल मात्र है, जो पहाड़ की दालों में अपनी विशेष तासीर के कारण खास स्थान रखती है। वैज्ञानिक भाषा में डौली कॉस बाईफ्लोरस नाम वाली यह दाल गुर्दे के रोगियों के लिए अचूक दवा मानी जाती है। उत्तराखंड में 12,319 हेक्टेयर क्षेत्रफल में इसकी खेती की जाती है।                              खरीफ की फसल में शुमार गर्म तासीर वाली यह दाल पर्वतीय अंचल में शीतकाल में ज्यादा सेवन की जाती है। पहाड़ में सर्द मौसम में गहत की दाल लजीज मानी जाती है। प्रोटीन तत्व की अधिकता से यह दाल शरीर को ऊर्जा देती है, साथ ही पथरी के उपचार की औषधि भी है। पर्वतीय क्षेत्र में गहत दाल दो प्रजातियां क्रमश: काली व भूरी के रू...