उत्तराखंड राज्य में स्थित बागेश्वर जिला

बागेश्वर उत्तराखण्ड राज्य में सरयू और गोमती नदियों के संगम पर स्थित एक तीर्थ है। यह बागेश्वर जनपद का प्रशासनिक मुख्यालय भी है। यहाँ बागेश्वर नाथ का प्राचीन मंदिर है, जिसे स्थानीय जनता "बागनाथ" या "बाघनाथ" के नाम से जानती है। मकर संक्रांति के दिन यहाँ उत्तराखण्ड का

सबसे बड़ा मेला लगता है। स्वतंत्रता संग्राम में भी बागेश्वर का बड़ा योगदान है। कुली-बेगार प्रथा के रजिस्टरों को सरयू की धारा में बहाकर यहाँ के लोगों ने अपने अंचल में गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन शुरवात सन 1920  ई. में की।

सरयू एवं गोमती नदी के संगम पर स्थित बागेश्वर मूलतः एक ठेठ पहाड़ी कस्बा है। परगना दानपुर के 473, खरही के 66, कमस्यार के 166, पुँगराऊ के 87 गाँवों का समेकन केन्द्र होने के कारण यह प्रशासनिक केन्द्र बन गया। मकर संक्रान्ति के दौरान लगभग महीने भर चलने वाले उत्तरायणी मेले की व्यापारिक गतिविधियों, स्थानीय लकड़ी के उत्पाद, चटाइयाँ एवं शौका तथा भोटिया व्यापारियों द्वारा तिब्बती ऊन, सुहागा, खाल तथा अन्यान्य उत्पादों के विनिमय ने इसको एक बड़ी मण्डी के रूप में प्रतिष्ठापित किया। 1950-60 के दशक तक लाल इमली तथा धारीवाल जैसी प्रतिष्ठित वस्त्र कम्पनियों द्वारा बागेश्वर मण्डी से कच्चा ऊन क्रय किया जाता था।

शिव पुराण के मानस खंड के अनुसार इस नगर को शिव के गण चंडीश ने शिवजी की इच्छा के अनुसार बसाया था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सन् 1602 मे राजा लक्ष्मी चन्द ने बागनाथ के वर्तमान मुख्य मन्दिर एवं मन्दिर समूह का पुनर्निर्माण कर इसके वर्तमान रूप को अक्षुण्ण रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

19वीं सदी के प्रारम्भ में बागेश्वर आठ-दस घरों की एक छोटी सी बस्ती थी। मुख्य बस्ती मन्दिर से संलग्न थी। सरयू नदी के पार दुग बाजार और सरकारी डाक बंगले का भी विवरण मिलता है। सन् 1860 के आसपास यह स्थान 200-300 दुकानों एवं घरों वाले एक कस्बे का रूप धारण कर चुका था। एटकिन्सन के हिमालय गजेटियर में वर्ष 1886  में इस स्थान की स्थायी आबादी 500 बतायी गई है।प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व, सन् 1905 में अंग्रेजी शासकों द्वारा टनकपुर-बागेश्वर रेलवे लाईन का सर्वेक्षण किया गया, जिसके साक्ष्य आज भी यत्र-तत्र बिखरे मिलते हैं।

 उत्तरायणी मेले के अवसर पर कुमाऊँ केसरी बद्री दत्त पाण्डेय, हरगोविंद पंत, श्याम लाल साह, विक्टर मोहन जोशी, राम लाल साह, मोहन सिह मेहता, ईश्वरी लाल साह आदि के नेतृत्व में सैकड़ों आन्दोलनकारियों ने कुली बेगार के रजिस्टर बहा कर इस कलंकपूर्ण प्रथा को समाप्त करने की कसम इसी सरयू तट पर ली थी। पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों का राष्ट्रीय आन्दोलन में यह योगदान था, जिससे प्रभावित हो कर सन् 1929 में महात्मा गांधी स्वयं बागेश्वर पहुँचे। 1947  में भारत की स्वतंत्रता के समय बागेश्वर नाम बागनाथ मंदिर के समीप स्थित बाजार तथा उसके आसपास के क्षेत्र के लिए प्रयोग किया जाता था। 1948  में बाजार से सटे ९ ग्रामों को मिलाकर बागेश्वर ग्रामसभा का गठन किया गया। 1952 में बागेश्वर को टाउन एरिया बना दिया गया, जिसके बाद वर्ष 1952 से 1955 तक टाउन एरिया रहा। 1955 में इसे नोटीफाइड एरिया घोषित किया गया। 1957 में ईश्वरी लाल साह स्थानीय निकाय के पहले अध्यक्ष बने।1968 में बागेश्वर की नगर पालिका का गठन कर दिया गया। 

बागेश्वर स्थित प्रसिद्ध मंदिर-
1.बागनाथ मंदिरभारत के उत्तराखण्ड के बागेश्वर
जिले के बागेश्वर में स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर है। यह उत्तर भारत में एक मात्र प्राचीन शिव मंदिर है जो कि दक्षिण मुखी है जिसमें शिव शक्ति की जल लहरी पूरब दिशा को है । यहाँ शिव पार्वती एक साथ स्वयंभू रूप में जल लहरी के मध्य विद्यमान हैं । यह बागेश्वर जिले का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है और बागेश्वर जिले का नाम भी इसी मंदिर के नाम पर पड़ा है। यह सरयू तथा गोमती नदियों के संगम पर बागेश्वर नगर में स्थित है. इस मंदिर की नक्काशी अत्यन्त प्रभाशाली है।

2. 
गौरी उड्यार, उत्तराखंड के बीहड़ कुमाऊं मंडल में, गौरी उदियार नामक एक कुख्यात गुफा मंदिर है। यह बागेश्वर शहर से लगभग 8 किमी दूर स्थित है और इसमें भगवान शिव की कई मूर्तियाँ हैं। कुमाउनी बोली में, 'उड़ियार' एक छोटी चट्टान की गुफा के लिए खड़ा है, जहां बाघ और अन्य जंगली जानवर रहते हैं। गुफा 20x95 वर्ग मीटर के बारे में मापती है और भगवान शिव की कई छवियों को निर्दिष्ट करती है।

3.कोट भ्रामरी, कोट भ्रामरी अथवा कोट की माई
उत्तराखण्ड के कुमाऊं मंडल के बागेश्वर जनपद में प्रसिद्ध बैजनाथ मंदिर समूह से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर एक ऊंची पहाड़ी पर अवस्थित है. 
कोट की माई अथवा भ्रामरी देवी के नाम से जाना जाने वाला यह देवालय इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि यहां पर कत्यूरियों की कुलदेवी भ्रामरी और चन्दों की कुलदेवी नंदा की सामूहिक अर्चना की जाती है. भ्रामरी देवी का विवरण दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में प्राप्त होता है. 

4.चण्डिका मन्दिरनगरदेवी चंडिका माता का मंदिर भीलेश्वर की पहाड़ी पर स्थित है। चंपावत के चंद राजा
1618 ईसवी में इसे अपने साथ लाए थे। साथ में ग्वाल देवता भी आए थे। प्राचीन काल में चंडिका, कालिका और चामुंडा के लिंग थे। 
वर्ष 1985 में चंडिका मंदिर बनने के बाद नई मूर्ति स्थापित की गई। साथ में संतोषी माता और बजरंग बली के मंदिर भी बनाए गए। नवरात्रों में यहां अष्टबलि दी जाती थी। जिसमें भैंसा बलि भी सम्मिलित थी। वर्तमान में बलि प्रथा बंद है। मंदिर के प्रधान पुजारी ने बताया कि चंडिका को महिषासुर मर्दिनी के रूप में पूजा जाता है। जो कि सर्वसिद्धदात्री देवी रूप है। यहां सभी मनोकामनाओं के निहितार्थ श्रद्धालु पूजा करते हैं। प्रत्येक तीसरे साल देवी भागवत का आयोजन होता है। मंदिर में पूजा कार्य के लिए बागेश्वर जनपद स्थित चौरासी के पांडे नियुक्त हैं। पुरातन काल से यहां पूजा करा रहे हैं। हैं। जो प्रथा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। वर्तमान चंडिका मंदिर कमेटी यहां शादी-विवाह का आयोजन भी कराती है।















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